Sunday, 7 June 2015

अवशेष

दिल में टूटे प्यार का 
रात का इकरार का
रास्ते इंतज़ार का
 बेबाक इजहार का
 वक़्त बिता कुछ ना बाकी 
टूटे से अवशेष है
लिखने को भी हाथ कांपे
 कुछ भी ना अब शेष है.....

@गद्दार

भुला दो..


मन लिखे, हाथ लिखे लिखे कागज़ कोरे से है
उस लिखे का क्या हो अब जो लिखा मन में मेरे,
दिल ये मेरा अब भी कहता जो हुआ उसे भूल जा
में भुलु या वो भूले कोई नहीं जो है भूलता | 
@gaddar

Saturday, 6 June 2015

शाम का वक़्त



मुहब्बत को उसकी आजमाने चला था
बस्ती को अलविदा कर वीराने चला था

मुमकिन था लौटना आसां तो ना था
गिरा के "गद्दार" खुद को मयखाने चला था

टी@गद्दार

हैरान

हैरान हु हो कर, परेशां यु सोच सोच कर
मिलता नहीं सिला भी यु रो रो कर

रहता है बन के अजनबी पूरी महफ़िल में मुझ से
बहाता अश्क तन्हाई में मिलने की दुआए कर
उसकी हालत में क्या कंहू “गद्दार” तुझे अब में
वो रुके तो लफ्ज़ कह लो, 
बहे तो दिलोदिमाग में शिप्रा बन कर.......

एक ग़ज़ल नस्तर सी


यु मेरे अल्फ़ाज़ को आवाज़ को अहसास को
सीने में उठती इक कसक घुटती हुई सी साँस को

यु कहे “गद्दार” मुझ से कह भी दे जज्बात को
में कहु या ना कहु चुप ही रहा खामोश सा
और खोजता उस बात को और कोसता उस याद को
मेरे अहसासो की आवाज़े भी कुछ है बोलती
और मेरी हर उस बात को नज़रअंदाज़ भी अब में ही करू
उसकी नज़रो से मुझे अब भी शिकायत न रही
मेरी बाते जानकर हर फैसला उसने किया
दिल पे उसके घाव जो मेने दिए अब तक हरे
और पूछ कर यु हाल एक गुनाह मेने किया
जिंदगी बर्बाद करना यु मेरी आदत रही
न कभी सोचा था मेने खुद भी यूं हो जाऊंगा
क्या करू अब में बयान गुनाह मुझसे हो गया
होगा न हक़ में फैसला सबूत भी खिलाफ है
अब मेरे भी दिल में चुभे तंग से सवाल है
क्या करू जवाब उनको देने वाला अब नहीं
जिंदगी भी किसी की यु ख़त्म होती नहीं
में भी कैसे भुला ये रातें भी अब लंबी सी है
मेने खेले खेल ऐसे जिनकी यादे अब तलक
जिंदगी कितनी बड़ी है कैसे भुला में ये सब
माफ़ कर के वो मुझे माफ़ यु करता नहीं
क्या करू गुनाह मेरे माफ़ी लायक हो नहीं
मेरी हदो का इस तरह जवाब उसने यु दिया
कुछ भी ना कहकर उसने हद से ज्यादा कह दिया
डालकर हाशिये पे मुझको क्या चल रहा मन में तेरे
“गद्दार”  अगर में जान लू तो क्या कंहूँगा में तुम्हे
उसकी चाहत को यु मेने पत्थरो पे लिख दिया
पत्थरो से बह गए सैलाब आज कितने भी
मेने सोचा सोचकर होतो नहीं है कुछ भला
क्यों सोचकर करता हु में बर्बाद थोडा वक़्त भी
@गद्दार

बारिश का असर

सर्द मौसम में उभारा नाम तेरा शीशे पे मगर
जाने क्यूं इस ओस ने उसको सब धुंधला दिया
गीली उंगलिया गाल पर अब लिख रही है और कुछ.........

Gaddar


खंज़र





यु  तो  मेरे  कत्ल  कि  कोई  वजह ना  थी 
और  वो  कहता  रहा  खंजर किफायती  दाम   थे 
–गद्दार