Saturday, 6 June 2015

चेहरा तेरा




तुज़े  से  नज़र  हटी   तो  कुछ  देखा  ना  गया
कौन  कहता  है  फूल  खिलते  है  बारिशे  भी  होती  है 
-गद्दार
रुख  पे  तेरे  नकाब  से  कई  सवाल  थे  खड़े 
लब  जो  तेरे  खुल  गए   हर  जवाब  पा  लिया
-गद्दार

वसीयत


कर दिल-ए-एतबार हकीकत थी मेरी वो

आखरी जो शेर था वसीयत थी मेरी वो
गद्दार

आंसुओ के हिसाब


आंसुओ के हिसाब


गिरती  बारिश  में  तेरे  रोने  के  क्या  सबब  हो
इतने  पानी  का  भला  खुदा भी कैसे  हिसाब  रखे
-गद्दार

सिक्का उछाल के

सिक्का उछाल के

तेरे  इजहार-ए- मुहब्बत  के  तरीके पे  हंसी आयी मुझको
मेरा  फैसला  लिया  तूने 
सिक्का  उछाल  के 
–गद्दार 

डूब रहा है।

एक गहरी सोच में डूब रहा है
या ” शिप्रा ” किनारे डूब रहा है
जख्म ने अपनी जगह बदली
या तीर निशाने से चूक रहा है
दवाओ में दर्द को या दर्द में दवाओ को
हाथ लिए चराग अँधेरा ढूंढ रहा है
मंजिल पे जाऊ या रास्ते पर ठहरु
वक़्त काटने को “गद्दार” ख्वाबो  में घूम रहा है

नहीं चाहता

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अब और  खोना नहीं चाहता
यु ही  कुछ पाना नहीं चाहता
“गद्दार” स्तब्ध सा खड़ा राहो में
मंज़िल से कहो वो आना नहीं चाहता।
@गद्दार

चाय

पीता नहीं शराब की मुझे इतना भी गम नहीं
तेरा नशा भुलाने को एक  चाय ही काफी है ।
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