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Saturday, 25 July 2015

बेबसी दिलकशी गद्दार

चलती सी आंधियों में पत्ता टिका नहीं
    अपने ही वायदों पे कायम रहा नही

      खोकर ही रह गयी है राहे मोड़ पे
      सीधे से रास्तो से तू भी चला नहीं

#gaddar

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        लफ्ज मिलते नही अपनी बेबसी के लिये
आमदा हाले दिल निकला है खुदकुशी के लिये

          ढूँढता रहता हूँ तहरीरे जिंदगी का सुकूँ
  खुशनुमा होता नही खत ये दिलकशी के लिये ।

Saturday, 11 July 2015

रिश्वत आस्तीनें गद्दार

अर्जियां खोकर रह गयी पत्थर दराज में
लौटाने को मेज़ मकतल ईमान रखता हूं।

बे परवाह भीड़ में भागते बेखबर  इंसान
पत्थरो में कांच का एक सामान रखता हूं।

  आस्तीन-ए-गद्दार   कई सांप पाले हुए
  दूर की नजरो का एक  गुमान रखता हूं।

उनसे कहो रिश्वत में कही   रियायत करो
सिफारिशों का उनकी अहसान रखता हूं।
#gaddar