सर्द सी मखमली हवा में मीठा सा ये लम्स घुले
गीली रेत के सहरा में जब सूरज भी है पिघले से
जाने कब आँगन में तेरे मिश्री से ये फूल खिले
झुकी-2 सी नज़र के संग में चोरी चोरी होंठ मिले
मेरे अंदर का शोर गूंजता है और लाता है जिसे बाहर, उस से लिखता हूँ मै जो, उसे नाम नही देता शेर, ग़ज़ल, नज्म अशआर का वो तो होते है बस बिखरें पन्नें मेरे
सर्द सी मखमली हवा में मीठा सा ये लम्स घुले
गीली रेत के सहरा में जब सूरज भी है पिघले से
जाने कब आँगन में तेरे मिश्री से ये फूल खिले
झुकी-2 सी नज़र के संग में चोरी चोरी होंठ मिले
टूटते शोले है फिर से जलने के लिए
मचलती बिजली जमीं से मिलने के लिए
सजा रखें है क्यूँ इन्हें बंद कमरो में
फूल तो था ही जंगल में खिलने के लिए
मुसाफिर रस्ते का क्यूँ ठहरा हुआ है
उठते है कदम कंही पे तो चलने के लिए
गैर पे तोहमत लगाना आसान है शायद
वो बदलेगा नहीं एक तेरे बदलने के लिए
वक़्त रहते तुम भी संभल जाओ "गद्दार"
मौका मिलता नहीं सब को संभलने के लिए #गद्दार