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Wednesday, 9 December 2015

वक़्त ठोकरें गद्दार

टूटते शोले है फिर से जलने के लिए
मचलती बिजली जमीं से मिलने के लिए

सजा रखें है क्यूँ इन्हें बंद कमरो में
फूल तो था ही जंगल में खिलने के लिए

मुसाफिर रस्ते का क्यूँ ठहरा हुआ है
उठते है कदम कंही पे तो चलने के लिए

गैर पे तोहमत लगाना आसान है शायद
वो बदलेगा नहीं एक तेरे बदलने के लिए

वक़्त रहते तुम भी संभल जाओ "गद्दार"
मौका मिलता नहीं सब को संभलने के लिए   #गद्दार

अंदाज़ा जवाब गद्दार

     हवाएँ क्यूँ ख़ुश्क है अंदाज़ा  लगाना
   लौट कर जाओ और दरवाजा लगाना

मेरे होंठो के तबस्सुम से खाओ न धोख़े
   जख़्म भर चला है कुछ ताज़ा लगाना

    सुन लो ये ग़ज़ल सवाल के जवाब में
फिर मेरी उन बातों का अंदाज़ा लगाना

   भूल जाओ कुछ नहीं अब नाम में मेरे
"गद्दार" कहकर ही तुम आवाज लगाना  #गद्दार

Monday, 7 December 2015

आईने

अपनी ही शक्शियत से फिर मुलाकात न हो
        आईने को भी मै ढक कर के देखता हूँ  #गद्दार

पहाड़

पहाड़ मेरे गम के कटते नहीं थे
नदी तुम्हारे भी बहुत अहसान है #गद्दार

Sunday, 29 November 2015

ख्याल

हल्के हाथों से मिटा रहा है चादरों से ख्याल मेरा
           मिटा भी पायेगा ज़ेहन से वो  विसाल मेरा  #गद्दार

(विसाल -मिलन)

Saturday, 28 November 2015

ये गुलाब

दिल में छुपा लो मगर खुशबुएँ ही दूँगा
मेरी फ़ितरत भी हुई कुछ गुलाब की तरह #gaddar

इक गुलाब

दिल में बसा कर गुलाब सा देखो
तमन्ना मेरी भी कुछ ख़ुश्बू सी अब #गद्दार

Tuesday, 24 November 2015

टूटता सितारा

क्या करे कोई सितारा टूट कर ख्वाहिश न हो
अब मेरी चाहत को भी मुझसे कोई ख्वाहिश नहीं

#gaddar

Sunday, 18 October 2015

खामोशियां जुर्म गद्दार

स्याही में अश्कों को घोलता रहा
मै खामोशियों कि जुबां में बोलता रहा

दरिया, मयख़ाने हर ठिकाने देखें
ज़ामें तिश्नगी में समंदर उड़ेलता रहा

चराग़ भी कंहा तक रौशनी बिखरें
     स्याह अंधेरो के मंज़र टटोलता रहा

मेरे हुनर को कहते है जुर्म "गद्दार"
में इक चाबी से हर ताले को खोलता रहा

#गद्दार

Saturday, 19 September 2015

वक़्त आसमान गद्दार

वक़्त भी अब क्या मेरा इम्तिहां लेगा
फुट कर रो देगा अगर जो जान लेगा

     कल का आया हुआ वो अजनबी
        क्या जगह हमारे दरमियां लेगा

तेरे अलावा एक ख्याल भी हो जेहन
दिल को छु कर के मेरा पहचान लेगा

पतंग ही तो लूटी थी फिज़ाओ ने तेरी
क्या लड़ कर खुदा से आसमान लेगा

#गद्दार

Friday, 11 September 2015

पत्थर गद्दार 2

दरिया कि ख़ामोशी को तोड़ने की जिद पर
           मेरे हाथ का हर  पत्थर गंवाया मैने

#गद्दार

पत्थर गद्दार 1

तेरा दर्द मेरे हाथों कि जद में ही है
खातिर उंगलियो को पत्थर से कुचल कर देखा

#गद्दार।

Sunday, 30 August 2015

कुछ शेर गद्दार

इन पलकों कि निगेहबानी में
अश्क का बहना मुनासिब नहीं लगता

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लाख आजादी कि दलीलों पर
वो परिंदा रिहा होकर रिहा नहीं लगता

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अपनी शर्तों पर जीने कि ख्वाहिशें
   कर ही देती है अक्सर तन्हा मुझे

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वक़्त पर अपनी ही प्यास बुझाते
     कुछ घड़े खुद में रीते ही मिले

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#गद्दार

Thursday, 9 July 2015

इश्क़ तन्हा गद्दार

एक मुद्दत से वो मिला नहीं
      हमें भी अब गिला नहीं

      न ख़त्म होती बातो का
         यु भी सिलसिला नहीं

     जरुरत से ज्यादा धुप से
      फूल भी अब खिला नहीं

     मंजिल, राह, गद्दार, तनहा
हमसफ़र नहीं, काफिला नहीं

#gaddar