इक गुनाह फिर लिक्खो मेरे गुनाह में
इंसाफ क्या मिलेगा तराजू में तौलकर
आ गए जो मुज़रिम तेरे गवाह में
सफ़र की थकन में हारा हुआ ये जिस्म
लौटकर ले आयेगा तेरी पनाह में
कितना हसीं राब्ता अश्क और आह का
मै उसके इम्तिहां में हूँ वो मेरे इम्तिहा में #गद्दार
मेरे अंदर का शोर गूंजता है और लाता है जिसे बाहर, उस से लिखता हूँ मै जो, उसे नाम नही देता शेर, ग़ज़ल, नज्म अशआर का वो तो होते है बस बिखरें पन्नें मेरे
देख कर इन हाथों में लकीर मेरी
फाड़ दो वो पास की तस्वीरें मेरी
शोर सी करती है यूँ खींच तान में
छटपटाने से दर्द की जंजीरें मेरी
होती नहीं है शक्लें हकीकत बारहा
ख़्वाब से जुदा होती है ताबीरें मेरी
आंधियां आह सी उठे या अश्क ए सुनामी
समन्दर तक शामिल है जागीरें मेरी
#गद्दार
वस्ल से खार खाये बैठा हूँ
मै फ़ूल से तितली उड़ाये बैठा हूँ
मोहब्बतों में ये रास आया मुझको
गैरो से दिल लगायें बैठा हूँ
शब् ए हिज्र गुजरना बाकी मुझ पर
मै शाम से दिया जलायें बैठा हूँ
मुहब्बत में गद्दारियों के अंजाम देख लो
अपनी ही तन्हाईयां लुटाये बैठा हूँ #गद्दार
अगर सोचूँ के ये हाथ
थामना चाहता है बारिशों को
भरना चाहता है अपने आगोश में
उन मोतीयों को जो टकरा कर बिखर जायेंगे
मानिंद ख़ुशी,
तो खो न देना तुम.......
समेट लो इन पानियों को...
जो कभी मेरा हिस्सा थी /कभी तुम्हारा /कभी हमारा
और कभी हम इस के और ..........
.ये हाथ तुम्हारा............#गद्दार
इक चेहरा वो अनजान हुआ
मुझे इश्क़ में फिर नुकसान हुआ
वो सर्द हवा बन गुज़र गया
मै बस्ती सा वीरान हुआ
सामने रख कर आईना
ये चेहरा फिर हैरान हुआ
रफ़्ता रफ़्ता दूसरा इश्क़
जब पहले के दौरान हुआ #गद्दार
टूटते शोले है फिर से जलने के लिए
मचलती बिजली जमीं से मिलने के लिए
सजा रखें है क्यूँ इन्हें बंद कमरो में
फूल तो था ही जंगल में खिलने के लिए
मुसाफिर रस्ते का क्यूँ ठहरा हुआ है
उठते है कदम कंही पे तो चलने के लिए
गैर पे तोहमत लगाना आसान है शायद
वो बदलेगा नहीं एक तेरे बदलने के लिए
वक़्त रहते तुम भी संभल जाओ "गद्दार"
मौका मिलता नहीं सब को संभलने के लिए #गद्दार