तेरा दर्द मेरे हाथों कि जद में ही है
खातिर उंगलियो को पत्थर से कुचल कर देखा
#गद्दार।
मेरे अंदर का शोर गूंजता है और लाता है जिसे बाहर, उस से लिखता हूँ मै जो, उसे नाम नही देता शेर, ग़ज़ल, नज्म अशआर का वो तो होते है बस बिखरें पन्नें मेरे
इन पलकों कि निगेहबानी में
अश्क का बहना मुनासिब नहीं लगता
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लाख आजादी कि दलीलों पर
वो परिंदा रिहा होकर रिहा नहीं लगता
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अपनी शर्तों पर जीने कि ख्वाहिशें
कर ही देती है अक्सर तन्हा मुझे
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वक़्त पर अपनी ही प्यास बुझाते
कुछ घड़े खुद में रीते ही मिले
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#गद्दार
शाम दुपहर का एक किनारा लिए
डूबी उल्फत तिनके का सहारा लिए
दर्द है तो दर्द की नुमाईशे न कर
कश्ती डूबी है समंदर का किनारा लिए
झुलसे "गद्दार" सहरा की तपिश में
लिखता है वो अक्सर एक इशारा लिए
#gaddar
इश्क़ में दर्द की इंतेहा ना कर
जख्म भरते नहीं, उन्हें ताज़ा ना कर
सो ही जायगी फ़ुर्क़ते शब् में
फासलों में अब और परेशां ना कर @गद्दार
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हिज्र ए शब् गुजरना बाक़ी मुझ पर
में शाम से चराग़ जलाये बैठा हू...@गद्दार
राज दफ़्न हो सारे, एक कुआ गहरा नहीं हु मै
ना उठा चीख मुझ पर के बहरा नहीं हु मै
बिजलियाँ कड़कती मुझ पे, अश्क़ की बारिशो में
बेलाग सा जंगल हु के सहरा नहीं हु मै
जीत की आरजू में, प्यादों की शह पर
हालात का मारा हु पर मोहरा नहीं हु मैं
#gaddar