भीगी सी जुल्फों को झटक कर पलटती हो
इक ख्याल कसीदे सा ग़ज़ल पन्नों को उलटती हो #gaddar
मेरे अंदर का शोर गूंजता है और लाता है जिसे बाहर, उस से लिखता हूँ मै जो, उसे नाम नही देता शेर, ग़ज़ल, नज्म अशआर का वो तो होते है बस बिखरें पन्नें मेरे
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Friday, 27 November 2015
Saturday, 3 October 2015
जुल्फ़े तुम्हारी
सर्द रातों में जुल्फे तुमने जब सँवारी है
दिल के जज्बात में आतिशे ही उभारी है ।
सुर्ख गालों से मिली रंगत सारे फूलों को
पार दरिया के जैसे कश्ती सी उतारी है ।
रंग होठों का लगा शामिल मौसिमे गुल सा
शोख नजरो में लगी मैय की ही खुमारी है ।
Tuesday, 14 July 2015
चाहत डायरियां गद्दार
चाहत में मोतियों सा बिखर के देखना
समेट ना पाओगी समेट के देखना
उलझ ही जायगी ये जुल्फ़े तुम्हारी
चाहो तो मुझ से लिपट के देखना
कंहा कंहा दर्ज है मुहब्बत हमारी
डायरियों के पन्नें उलट के देखना
हर नजर तुम्हारी घायल करती है हमें
चाहो तो बार बार पलट के देखना
#gaddar
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