हल्के हाथों से मिटा रहा है चादरों से ख्याल मेरा
मिटा भी पायेगा ज़ेहन से वो विसाल मेरा #गद्दार
(विसाल -मिलन)
मेरे अंदर का शोर गूंजता है और लाता है जिसे बाहर, उस से लिखता हूँ मै जो, उसे नाम नही देता शेर, ग़ज़ल, नज्म अशआर का वो तो होते है बस बिखरें पन्नें मेरे
हल्के हाथों से मिटा रहा है चादरों से ख्याल मेरा
मिटा भी पायेगा ज़ेहन से वो विसाल मेरा #गद्दार
(विसाल -मिलन)
स्याही में अश्कों को घोलता रहा
मै खामोशियों कि जुबां में बोलता रहा
दरिया, मयख़ाने हर ठिकाने देखें
ज़ामें तिश्नगी में समंदर उड़ेलता रहा
चराग़ भी कंहा तक रौशनी बिखरें
स्याह अंधेरो के मंज़र टटोलता रहा
मेरे हुनर को कहते है जुर्म "गद्दार"
में इक चाबी से हर ताले को खोलता रहा
#गद्दार
वक़्त भी अब क्या मेरा इम्तिहां लेगा
फुट कर रो देगा अगर जो जान लेगा
कल का आया हुआ वो अजनबी
क्या जगह हमारे दरमियां लेगा
तेरे अलावा एक ख्याल भी हो जेहन
दिल को छु कर के मेरा पहचान लेगा
पतंग ही तो लूटी थी फिज़ाओ ने तेरी
क्या लड़ कर खुदा से आसमान लेगा
#गद्दार